उत्तराखंड के पलायन, वीरान होते गांवों और बुजुर्ग माता-पिता की बेबसी की ऐसी मार्मिक कहानी, जो पर्दे पर खत्म होने के बाद भी दिल और जेहन में जिंदा रहती है।
पहाड़ों की खूबसूरती के पीछे छिपे दर्द को आखिर कौन देखता है ? ऊंचे पहाड़, घने जंगल, कलकल बहती नदियां और खूबसूरत वादियां पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं, लेकिन इन्हीं पहाड़ों के बीच कुछ ऐसे गांव भी हैं, जहां अब इंसानी आवाजें कम और खामोशी ज्यादा सुनाई देती है। कभी बच्चों की किलकारियों से गूंजने वाले घर आज सूने पड़े हैं। जिन आंगनों में कभी परिवार साथ बैठकर हंसता था, वहां अब उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंचे बुजुर्ग एक-दूसरे का सहारा बने जिंदगी गुजार रहे हैं।
इसी कड़वी हकीकत, दर्द, बेबसी और अपनों के इंतजार को बड़े पर्दे पर उतारती है फिल्म ‘पायर’ (Pyre)। चर्चित फिल्मकार विनोद कापड़ी के निर्देशन में बनी यह फिल्म महज मनोरंजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों में तेजी से बदलते सामाजिक जीवन और पलायन की त्रासदी का एक संवेदनशील दस्तावेज है।
आज जब सिनेमा की दुनिया में बड़े बजट, नामचीन सितारों और चकाचौंध का बोलबाला है, ऐसे दौर में ‘पायर’ बेहद सादगी के साथ दर्शकों के सामने आती है। इस फिल्म में न कोई बनावटी चमक है और न ही भावनाओं को बेचने वाला शोर। इसकी असली ताकत है पहाड़ की मिट्टी से जुड़ी एक ऐसी कहानी, जिसे देखकर लगता है कि यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि हमारे आसपास के किसी गांव की सच्चाई है।
फिल्म की कहानी पहाड़ के एक बुजुर्ग दंपति के इर्द-गिर्द घूमती है। उम्र ढल चुकी है, शरीर कमजोर हो चुका है, लेकिन उम्मीद अभी जिंदा है। बेटा वर्षों पहले गांव छोड़कर दूर जा चुका है। पीछे रह गए हैं बूढ़े मां-बाप, जिनकी दुनिया अब एक-दूसरे तक सिमटकर रह गई है। उनके जीवन में छोटी-छोटी खुशियां हैं, कभी हल्की नोकझोंक है, कभी तकरार है और कभी एक-दूसरे के प्रति बेपनाह अपनापन।
लेकिन इन सबके बीच एक खालीपन हमेशा बना रहता है… अपनों के लौटने का इंतजार।
जिस पहाड़ को छोड़कर बच्चे चले गए.. फिल्म का सबसे मार्मिक पक्ष यही है कि यह पलायन को केवल रोजगार या बेहतर भविष्य की तलाश तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसके पीछे छूट जाने वाले रिश्तों की कीमत भी दिखाती है।
रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में पहाड़ से मैदानों और बड़े शहरों की ओर जाने वाले युवाओं के पीछे अक्सर उनके बूढ़े माता-पिता रह जाते हैं। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, वही हाथ बुढ़ापे में सहारे के लिए तरसते हैं। जिन आंखों ने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के सपने देखे, वही आंखें अब उनके घर लौटने की राह तकती हैं।
कभी फोन की घंटी उम्मीद जगाती है, तो कभी दरवाजे पर किसी की आहट दिल में हलचल पैदा कर देती है। त्योहार आते हैं, मौसम बदलते हैं, गांव की पगडंडियां सूनी होती जाती हैं, लेकिन इंतजार खत्म नहीं होता।
‘पायर’ इसी इंतजार की पीड़ा को इतनी सहजता से सामने रखती है कि दर्शक खुद को उस बुजुर्ग दंपति के करीब महसूस करने लगता है।
बेरीनाग की वादियों में फिल्माई गई पहाड़ की सच्ची तस्वीर
फिल्म की शूटिंग वर्ष 2022 में पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग क्षेत्र की प्राकृतिक वादियों में की गई थी। पहाड़ों का प्राकृतिक परिवेश, गांवों की सादगी और वहां के जीवन की वास्तविक परिस्थितियां फिल्म को एक अलग संवेदनशीलता प्रदान करती हैं।
फिल्म के निर्माण और निर्देशन के लिए विनोद कापड़ी ने करीब आठ वर्षों तक मेहनत की। इसकी कहानी और प्रस्तुति को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी सराहना मिली है। फिल्म अब तक 18 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम कर चुकी है। तेलिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल में इसके प्रीमियर को भी दर्शकों की सराहना मिली।
फिल्म की शूटिंग से जुड़े जयमित्र सिंह बिष्ट ने इससे जुड़ी खास तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि ‘पायर’ उत्तराखंड में पलायन के गंभीर मुद्दे पर समाज को सोचने और चर्चा करने के लिए मजबूर करती है।
बुजुर्ग कलाकारों का अभिनय नहीं, मानो जिंदगी का सच पर्दे पर उतर आया हो
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसके बुजुर्ग कलाकारों का सहज और प्रभावशाली अभिनय है। उनके चेहरे की झुर्रियां, आंखों में छिपी उदासी, छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराहट और एक-दूसरे के प्रति उनका लगाव कहानी को जीवंत बना देता है।
कई दृश्य ऐसे हैं, जहां संवादों की जरूरत ही महसूस नहीं होती। खामोशी बहुत कुछ कह जाती है। कभी एक नजर में बरसों का इंतजार दिखाई देता है, तो कभी किसी छोटी-सी बात में जीवनभर का अपनापन।
यही वजह है कि फिल्म देखते समय दर्शक केवल किरदारों को नहीं देखते, बल्कि अपने घर, अपने माता-पिता और अपने गांव को याद करने लगते हैं। कई भावुक दृश्य मन को भीतर तक छू जाते हैं और आंखें नम कर देते हैं।
यह सिर्फ फिल्म नहीं, सवाल है
‘पायर’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह दर्शकों को केवल भावुक करके नहीं छोड़ती, बल्कि कई असहज सवाल भी सामने रखती है।
क्या विकास की दौड़ में हमने अपने गांवों को पीछे छोड़ दिया है? क्या बेहतर जिंदगी की तलाश में हम उन माता-पिता को भूलते जा रहे हैं, जिन्होंने हमारी जिंदगी संवारने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया? क्या पहाड़ों से पलायन की चर्चा केवल आंकड़ों और सरकारी योजनाओं तक सीमित रह जाएगी ?
यह फिल्म उन तमाम सवालों को सामने रखती है, जिनका जवाब केवल सरकारों के पास नहीं, बल्कि समाज और हम सबके पास भी होना चाहिए।
हो सकता है कि बड़े बजट की फिल्मों की तरह ‘पायर’ की चर्चा टिकट खिड़की के आंकड़ों से न हो, लेकिन इसकी असली सफलता उस एहसास में है, जो सिनेमाघर से बाहर आने के बाद भी दर्शकों का पीछा नहीं छोड़ता।
यह फिल्म याद दिलाती है कि पहाड़ केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं। यहां घर हैं, रिश्ते हैं, बुजुर्गों की उम्मीदें हैं और उन आंगनों की यादें हैं, जहां कभी पूरा परिवार एक साथ रहता था।
‘पायर’ उन खाली होते घरों की आवाज है, उन बूढ़ी आंखों का इंतजार है और उन रिश्तों की पुकार है, जिन्हें समय और दूरी धीरे-धीरे कमजोर कर रहे हैं।







