छात्रसंघ चुनाव_गढ़वाल में ABVP का सूपड़ा साफ,, क्या 2027 में दिखेगा असर ?

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श्रीनगर गढ़वाल: उत्तराखंड की सियासत में छात्रसंघ चुनावों को अक्सर सत्ता की राजनीति का शुरुआती संकेत माना जाता है। ऐसे में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) को मिली करारी शिकस्त ने आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। हालांकि छात्रसंघ चुनाव के नतीजों को सीधे विधानसभा चुनाव का पैमाना मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इन परिणामों ने भाजपा के मजबूत माने जाने वाले गढ़वाल क्षेत्र में छात्र राजनीति के बदलते रुझानों की ओर जरूर इशारा किया है।

बिड़ला परिसर में अध्यक्ष पद पर जय हो ग्रुप के हिमांशु भंडारी ने ABVP के भुवन चमोली को करीब 1500 मतों के बड़े अंतर से हराया। वहीं सचिव पद पर NSUI के मयंक बहुगुणा ने ABVP के पंकज को मात देकर संगठन की वापसी दर्ज कराई। उपाध्यक्ष पद पर छात्रम् के पुलकित अग्रवाल और सह-सचिव पद पर निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत हासिल की। कोषाध्यक्ष पद पर रामरूप गुर्जर निर्विरोध निर्वाचित हुए।

सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश पौड़ी परिसर से सामने आया, जहां NSUI ने अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष समेत प्रमुख पदों पर अपना कब्जा जमाया। दूसरी ओर ABVP का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा।

भाजपा के गढ़ में छात्र राजनीति का बदला समीकरण

पौड़ी गढ़वाल को लंबे समय से भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। जिले की सभी छह विधानसभा सीटों पर भाजपा के विधायक हैं। प्रदेश सरकार में प्रभावशाली मंत्री धन सिंह रावत और सतपाल महाराज जैसे नेताओं का राजनीतिक आधार भी इसी गढ़वाल क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे में विश्वविद्यालय चुनावों में ABVP का कमजोर प्रदर्शन स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन गया है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या छात्रसंघ चुनाव का यह परिणाम 2027 के विधानसभा चुनाव में भी दिखाई देगा ?

इसका जवाब फिलहाल निश्चित रूप से देना मुश्किल है। छात्र राजनीति और विधानसभा चुनाव की परिस्थितियां अलग होती हैं। छात्रसंघ चुनावों में स्थानीय मुद्दे, व्यक्तिगत लोकप्रियता, छात्र समस्याएं और प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ निर्णायक होती है, जबकि विधानसभा चुनाव में सरकार का कामकाज, बेरोजगारी, विकास, महंगाई, स्थानीय समीकरण, जातीय-सामाजिक समीकरण और राष्ट्रीय राजनीतिक माहौल जैसे कई कारक प्रभाव डालते हैं।

फिर भी उत्तराखंड की राजनीति में छात्रसंघ चुनावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

छात्र राजनीति से निकले कई बड़े चेहरे

गढ़वाल विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति का उत्तराखंड की मुख्यधारा की राजनीति से पुराना रिश्ता रहा है। राज्य में कई राजनीतिक चेहरे छात्र राजनीति से निकलकर विधानसभा और सरकार तक पहुंचे हैं। इसलिए विश्वविद्यालय परिसर में बदलती राजनीतिक पसंद को राजनीतिक दलों के लिए एक ग्राउंड लेवल संकेत जरूर माना जा सकता है।

इस बार के नतीजे खास इसलिए भी हैं क्योंकि विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले छात्र मतदाताओं के बीच ABVP को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। हिमांशु भंडारी की बड़ी जीत और NSUI की वापसी ने विपक्षी खेमे को उत्साहित किया है, जबकि भाजपा के लिए यह अपने छात्र संगठन की रणनीति और कैंपस कनेक्ट की समीक्षा का संकेत हो सकता है।

क्या 2027 में बदलेगा मूड?

गढ़वाल विश्वविद्यालय के चुनाव परिणामों को विधानसभा चुनाव का ‘सेमीफाइनल’कहना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन इन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना भी राजनीतिक भूल हो सकती है। छात्रसंघ चुनावों ने फिलहाल इतना जरूर दिखाया है कि गढ़वाल के युवाओं के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कायम है और छात्र संगठनों के पारंपरिक समीकरण बदल सकते हैं।

अब असली परीक्षा 2027 में होगी_क्या विश्वविद्यालय परिसर में दिखाई दिया यह बड़ा चेंज युवा मतदाता के बीच भी दिखाई देगा, या विधानसभा चुनाव में स्थानीय और व्यापक राजनीतिक मुद्दे एक बार फिर समीकरण बदल देंगे …?

फिलहाल गढ़वाल विश्वविद्यालय का परिणाम भाजपा के लिए चेतावनी और कांग्रेस-NSUI के लिए उत्साह का संकेत जरूर बन गया है।

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