हल्द्वानी में सेमिनार – महिलाओं पर हिंसा अब बर्दाश्त नहीं..

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हल्द्वानी :
समाज में बढ़ती महिला हिंसा के खिलाफ आज हल्द्वानी के सत्यनारायण मीटिंग हॉल में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र द्वारा एक महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत महिला समानता के संघर्ष के दौरान असमय मारी गयी महिलाओं को दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि देने से हुई, जिसके बाद “कारवां चलता रहेगा…” गीत के साथ सेमिनार आरंभ हुआ।

कार्यक्रम में महिला हिंसा, पितृसत्तात्मक मानसिकता, उपभोक्तावादी संस्कृति और सरकारी नीतियों की नाकामियों पर व्यापक चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि दुनिया भर में सरकारें 25 नवंबर को महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हर तीसरी महिला किसी न किसी रूप में हिंसा का शिकार होती है।

“कानून बनते हैं, हिंसा बढ़ती है”वक्ताओं का सरकारों पर तीखा सवाल

महासचिव रजनी जोशी ने कहा कि महिला हिंसा पर दुनिया भर में शपथ तो ली जाती है, लेकिन हालात जस के तस हैं।
विजेयता (परिवर्तनकामी छात्र संगठन) ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की घोषणा भी महिला अधिकार आंदोलनों के दबाव का नतीजा थी, मगर “मिरावल बहनों की हत्या को सिर्फ महिला हिंसा बताना असल तानाशाही को छुपाने की कोशिश” है।

पिंकी गंगवार (इंकलाबी मज़दूर केंद्र) ने कहा कि सरकारें हर बड़ी घटना के बाद सिर्फ कानून बनाती हैं, लेकिन जमीन पर बदलाव न दिखने से हिंसा लगातार बढ़ रही है।

वक्ताओं ने WHO की 2024 रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पूंजीवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति ने हिंसा को और विकराल बना दिया है“महिला शरीर को उपभोग की वस्तु की तरह पेश करने वाली विचारधारा हिंसा को बढ़ावा दे रही है।”

उत्तराखंड में भी बढ़ते महिला अपराध—“देवी की भूमि कहकर जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता”

प्रगतिशील भोजनमाता संगठन की अध्यक्ष शारदा ने कहा कि राज्य स्थापना के 25 साल पूरे होने के बावजूद उत्तराखंड में महिला अपराध चिंताजनक गति से बढ़ रहे हैं।

उन्होंने कहा“जहां महिलाओं को देवी का स्वरूप कहा जाता है, वहीँ पितृसत्तात्मक सोच और सामंती मूल्य आज भी महिलाओं की सुरक्षा पर सबसे बड़ा खतरा हैं।”

“महिला अधिकार छीने जा रहे, महिलाएं अब भी दोयम दर्जे में”वक्ताओं के तीखे बयान

सेमिनार में कहा गया कि घरों से लेकर कारखानों तक, महिलाएं कम वेतन, घरेलू शोषण और भेदभाव का सामना कर रही हैं।
बयान में यह भी कहा गया कि पिछले 100 साल में बड़ी मुश्किल से हासिल किए गए महिला अधिकारों को “आज की सत्ता” फिर से सीमित करने की कोशिश कर रही है।

क्रालोस के अध्यक्ष प्रेम प्रसाद आर्या ने कहा“घर हो या दफ्तर, महिलाएं कहीं सुरक्षित नहीं। उपभोक्तावादी मुनाफाखोर व्यवस्था और पुरुषवादी मानसिकता मिलकर हिंसा को बढ़ा रही है। अब महिलाओं को दोनों से लड़ना होगा।”

बसंती पाठक (उत्तराखंड महिला मंच) ने कहा कि महिलाएं आज भी “घरेलू, धार्मिक और पूंजीगत तीनहरी गुलामी” की शिकार हैं और जब तक इन बेड़ियों को नहीं तोड़ा जाएगा, हिंसा खत्म नहीं होगी।

कई संगठनों की मजबूत भागीदारी

सेमिनार में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, इंकलाबी मजदूर केंद्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, ACTU, आशा वर्कर यूनियन, उत्तराखंड महिला मंच, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन, ठेका मजदूर कल्याण समिति, भीम आर्मी, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी समेत अनेक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल रहे।

कार्यक्रम में बिंदू गुप्ता, रजनी जोशी, बसंती पाठक, टी.आर. पाण्डेय, हेमा देवी, आरती गुप्ता, हिमानी अगरिया, पिंकी गंगवार, विजेयता, पी.सी. तिवारी, चंपा देवी, शारदा, सहित दर्जनों प्रतिभागी मौजूद रहे।

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