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भारत और नैपाल के हिमालय क्षेत्र में पारंपरिक जल व्यवस्था, संरक्षण और इससे जुड़ी जानकारियां पर चर्चा के लिए नैनीताल में एक दिवसीय सैमिनार का आयोजन हुआ। आयोजन में दोनों देशों से इतिहास, जल संरक्षण और पर्यावरण से जुड़े विशेसज्ञों ने हिस्सा लिया।
कुमाऊं विश्वविद्यालय के हरमिटेज भवन में इतिहास विभाग और यू.जी.सी. एम.एम.टी.टी.सी.द्वारा अयोजित कार्यक्रम में अतिथियों ने अपने विचार रखे। चित्रों के माध्यम से नैपाल और भारत के इन हिस्सों में जल संरक्षण की समानताओ को दर्शाया गया। दोनों देशों में नौलों और घरों में भगवान विष्णु को जल संरक्षण का मुख्य स्रोत बताया गया। ये कहा गया कि तब पानी को गवाह मानकर पवित्र विवाह तक हो जाता था। कार्यक्रम के आयोजक सचिव प्रो.रितेश साह ने सभी विशिष्ट अतिथियों और मौजूद लोगों का स्वागत किया। नैपाल के बैतड़ी, निंगलासैनी, डूंगरासेठी, घटल मंदिर, डडेलधूरा, डोटी, दार्चुला के साथ ऊत्तराखण्ड के अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और नैनीताल में रिसर्च हुई थी। सैमिनार में चाल, खाल, गुल, सॉइल इरोजन, 75प्रतिशत सूखे ग्लेशियरों, घराट आदि पर विस्तार से चर्चा हुई। इस मौके पर जे.एन.यू.के प्रो.राजेश खरात, नैपाल से डॉ.संजीव कुमार भुचर, प्रो.पी.सी.तिवारी, प्रो.वसुधा पांडेय, प्रो.अनीता पाण्डे, कैलाश पांडेय, के.यू.के रैजिसट्रार मंगल सिंह मंद्रवाल, प्रो.संजय घिल्डियाल आदि उपस्थित रहे।
नैपाल के सुदूरवर्ती पश्चिम प्रोविंस के पूर्व मुख्यमंत्री राजेन्द्र सिंह रावल ने जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों के बारे में बताया। उन्होंने विलुप्त होती पद्वति के खतरों को उजागर करते हुए विकास की दौड़ में विनास का आमंत्रण समझाया। हिंदी, इंग्लिश, नैपाली और कुमाउनी भाषा के अच्छे जानकार राजेन्द्र सिंह रावल ने दोनों देशों के महत्वपूर्ण वॉटर टावर हिमालय पर बोला।



